चुनाव - प्रचार या आलोचना - प्रसार
बात चाहे दिल्ली की हो या अन्य राज्यों के चुनाव - प्रसार की हो होता तो बस एक जैसा ही हैं। आम आदमी को समानता मिले न मिले समानता तो दिखने को मिलती हैं - आलोचना करना। पंचायती - राज से लेकर लोक- सभा चुनाव तक का यह दोषारोपण का सिलसिला अब अपने चरम सीमा पर हैं, बिना किसी विरोध के। एक तरफ हमारे नेता खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं और चुनाव - प्रचार कर मंच पर आते ही शुरू करते हैं ,अभद्र भाषाओं का अविराम आलोचना - प्रसार। दोषारोपण की यह प्रक्रिया साफ़ - साफ़ बता रही हैं की अब इनके पास अपने बारे में भी अच्छा बोलने का एक शब्द तक नही हैं और हमलोग इनके ही हाँथो लोकतंत्र की बागडोर सौंपने जा रहे हैं ,जो की लोकतंत्र की कम "ढोंगतंत्र" की ही बस बात करते हैं।
- रवि कुमार गुप्ता
लालबेगी , गोपालगंज {बिहार}
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