Wednesday, 11 February 2015

फिर वैलेंटाइन -डे पर वार होगा ,क्या ?

फिर  वैलेंटाइन -डे पर वार होगा ,क्या ?

बसंत की बहारे यानि की महकता - दमकता चमन ,पीली लिबास में दुल्हन -सी धरा और मन चुराती कोयल की कूँ ,कूँ..,वाह ! क्या सुंदरता हैं ,काश की यह बसंत कभी जाता नहीं पर बसंत जायेगा नहीं तो फिर सावन कैसे आएगा ? इस मोहब्बत भरे माह में प्यार के लिए बनाया दिन "वैलेंटाइन -डे" जो की हम सब अपने माँ या दोस्तों के साथ मनाते हैं और बिना किसी भेदभाव के। इस प्यार के ऊपर भी कोई एतराज़ कर के कोई किसी दल के साथ वार कर के खुद को समाज का रक्षक बताता  हैं तो फिर ये कितने हद तक सही हैं ? संसार और संविधान के नियमों को ताक पर रखकर हैवानियत का खेल खेलने वालों को हक़ कौन दिया हैं ? ये सवाल तो तब तक उठेगा जब तक मोहब्बत- जिन्दा रहेगी और सच तो यह भी हैं की बिना प्यार के संसार की कल्पना करना भी निरर्थक हैं। 
हमारे देश में तो खास कर प्यार का नाम धर्म से जोड़कर  फसाद कराने की प्रथा बन चुकी हैं लेकिन निरर्थक लड़ने वालों की हमेशा हार ही होती हैं। देखना तो यह हैं की इस बार बसन्त के उड़ते परिंदो को कौन -सी सेना शिकार बनाती हैं या इंसानियत के नाते उन्हें उड़ने देती हैं "उन्मुक्त - गगन में " बेख़ौफ़। 

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