Monday, 16 February 2015

मुफ्त के वादे नहीं, रोजगार चाहिये

मुफ्त के वादे नहीं, रोजगार चाहिये 

वोट के लिए वादा करना भारत के चुनाव के लिए आम मुद्दा हैं। यही तो एक ऐसा रामबाण हैं जिसका असर आम आदमी से लेकर दमदार आदमी तक दिखता हैं। इस बार "आप " ने भी इसी का प्रयोग किया और चर्चे में भी रही।  कहीं ऐसा तो नहीं की इस "मुफ्त " के नीचे भी छोटे - छोटे अक्षरों में लिखा हैं "नियम व शर्ते लागू " । खैर जो भी हो ,वैसे भी हम 60 सालों से भारत का नव - निर्माण ही तो करते आ रहे हैं ,परन्तु अफसोस की जो बचा था उसे भी बचा ना सके।आजादी के बाद भी अबतक सिर्फ नए - नए मुद्दे ही सुनते आ रहे हैं और आज तो हाल ऐसा हो गया हैं की पढ़ - लिखकर भी बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ रही हैं। मुफ्त की पढ़ाई , ड्रेस और खाना के साथ - साथ मुफ्त की बेरोजगारी भी मिल जाती हैं। अब हम युवाओं को अंतर्मन से जागकर मुफ्त के प्रलोभन को त्यागना चाहिए क्यूंकि जब हमारे पास रोजगार होगा तो हमारी सारे दिक्कते दूर हो जाएँगी। भूखा पेट हर काम करने को विवश हो जाता हैं और रोजगार पेट को भर कर हर विवशता को भगा देता हैं।  वादे तो हमारे परदादे भी सुने थे पर अब हमे सिर्फ रोजगार चाहिए। 

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