Tuesday, 24 March 2015

न्याय की मौलिकता को समझे

न्याय की मौलिकता को समझे 

न्याय का मार्ग सारे मार्ग से भिन्न और पावन होता  हैं। न्याय तो अपराधी के लिए सबब और सबक होता हैं। अपराध की संलिगता को देखते हुए ही न्याय मिलना चाहिए यानि की वो अपराधी आने वाले कल में समाज के लिए घातक होगा या सार्थक। न्याय को हर आरक्षण से दूर ही रखना चाहिए। हमारे वर्तमान समाज में हर बात को राजनीतिक मुद्दा बना कर उसके वास्तविकता को भटकाया जा रहा हैं ,जिसके वजह से न्यायिक अधिकारीयों को अपने कार्य को करने में काफी मानसिक दिक्तते हो रही हैं और न्याय देने में विलम्ब।  न्यायिक कार्यों में राजनीतिक हस्तक्षेप तो होना ही नहीं चाहिये और साथ ही साथ अपराधियों के साथ धर्म ,जाति या किसी राष्ट्र का नाम जोड़कर धरना - प्रदर्शन करने वालो को अविलम्ब हिरासत में लेकर न्यायिक कार्यवाही करनी चाहिये ताकि यह रवैय्या बंद हो जाये। न्यायिक - मामलों में बाहरी हस्तक्षेप की वजह से न्याय में काफी विलम्ब होता  है ,लोगो का भरोसा भी टूटता  हैं और साथ ही साथ आर्थिक हानि भी उठानी पड़ती हैं सरकार को। हमारे न्यायिक गरिमा का गुणगान अन्य देश करते हैं और एक हम हैं की अपनी ही गरिमा को धराशायी करने पर उतारू हो चूके हैं। न्याय को खंडित करने का परिणाम हमे अभी देखने को मिल रहा हैं की दिन - प्रतिदिन अपराधिक घटनाएँ बढती ही  जा रही हैं और हमलोग ही शिकार हो रहे हैं। हमे अन्याय से लड़ना  न्यायिक  हैं पर न्याय का विरोध करना अपराध हैं ,जिसे हमलोगो को सचेत हो कर  समझने की जरूरत हैं। न्याय की गरिमा को बरकरार रखते हुए हमे उसका अनुपालन करना चाहिए ताकि संविधान की सुंदरता बरक़रार रहे। 

Thursday, 19 March 2015

रवि की मौत की सीबीआई जाँच पर सियासत क्यों ?

रवि की मौत की सीबीआई जाँच पर सियासत क्यों ?

भ्र्ष्टाचार के विरोधी आईएएस  स्व. डी के रवि को अभी चिता अगन से ठण्डक भी नहीं मिली की सियासी दावपेंच का खेल शुरू हो गया हैं। रवि जी का कल उनके ईमानदारी व सुकर्मठता का गुणगान कर रहा हैं फिर भी हमारे राजनेता क्यों अनसुना कर रहे हैं ?क्यूंकि वो भ्र्ष्टाचार - विरोधी थे या फिर आज के समाज में शहीदों का कोई वजूद ही नहीं हैं। कर्नाटक - सरकार के लिए खुद को लूटाने वाले  रवि जी की हत्या के रहस्य का सीबीआई - जाँच होना ही चाहिए क्यूंकि मौजूदा हमारे समाज में ईमानदार अधिकारी बहुत ही अल्प हैं और अगर हम इसी तरह से अपने सामाजिक - रक्षकों की हत्या पर खामोश रहेंगे तो आने वाले कल में साफ़ छवि के को देखना असंभव हो जायेगा। सीबीआई - जांच के लिए केंद्र सरकार के साथ कर्नाटक - सरकार को भी आगे आकर मामले की सच्चाई को जानना चाहिए ताकि हत्यारों को सजा और उनके परिवार को सामाजिक - न्याय मिल सके। कर्णाटक - सरकार को अपना नकारात्मक फैसला वापस ले लेना चाहिए और न्याय की गरिमा को बरकरार रखना चाहिए। हमारे देश में सियासी - सवाल तो उठते  ही रहते परन्तु एक   भ्र्ष्टाचार - विरोधी आईएएस अधिकारी की मौत पर नकारात्मक राजनीति करना अशोभनीय है तथा समाज के पक्ष से भिन्नात्मक हैं। सियासी - बादलों से रवि का निकालना ही हमारे लिए उज्जवल होगा। 

Wednesday, 18 March 2015

पुरुषों की मर्यादा और नारी - सम्मान को समानता दे

 पुरुषों की मर्यादा और नारी - सम्मान को समानता दे 

किसी भी स्थिति में एक तरफ़ा हो जाना हितकारी नहीं होता हैं अर्थात "अति सर्वत्र वर्जयते " तो आपने सुना ही हैं और इस वक़्त हमारा समाज नारी के पक्ष में ढल चूका हैं, जो की पूर्णतः समाज के लिए हितकर नहीं हैं। यह सच  हैं की पुरुषों के क्रूरता को देखते हुए यह फ़ैसला लिया गया और  समाज भी एक दम से नारी के तरफ ही झुक गया हैं। एक तरफे होने का ही परिणाम हैं की आज - कल बहुत सारे केस गलत भी हो रहे हैं और इस बात का फायदा उठाते हुए नारी पुरुषों का शोषण भी कर रही हैं। पुरुष यदि किसी सही काम के लिए भी नारी को कुछ बता रहा हैं तो नारी उसे किसी और ही नज़रिये से लेते हुए नकारात्मक भाव प्रकट कर रही हैं। आए दिनों इस तरह के बहुत से मसले सामने आ रहे हैं और अब गृहणियाँ भी इसका गलत फायदा उठा रही हैं ,जो की हमे गावों और शहरों में देखने को मिल रहा हैं। आज यदि नारी बाजार में बस चिल्ला दे रही हैं तो हजारों हाथ बिना सोंचे समझे पुरुषो को पीटने के लिए उठ जा रहे हैं। नारी - सशक्तिकरण और सुरक्षा को बढ़ावा देना जरुरी हैं परन्तु सामाजिक समानता को भी ध्यान में रखना चाहिए और ऐसे मुद्दों का समाधान ईमानदारी और जाँच - पड़ताल के बाद ही करना चाहिए,ताकि पुरुषों की मर्यादा और नारी - सम्मान बरक़रार रहे।   

Saturday, 14 March 2015

आत्मविश्वास व आत्मबल के अभाव में होती आत्महत्या

आत्मविश्वास व आत्मबल के अभाव में होती आत्महत्या 

"मान ले तो हार ,ठान ले तो जीत " इन्हीं बातों को बोलते - सुनते हैं फिर क्यों हम विवश होकर क्षणिक मात्र में अनमोल जीवन को   त्याग देते हैं। हर झूठ का हार सम्भव हैं और सत्य की जीत सुनिश्चित होती हैं ,यदि कार्य पूरे आत्मविश्वाश व लगन से किया जाये तब। आत्महत्या कर लेना समस्या का समाधान नहीं बल्कि विवश करने वालों का मनोबल बढ़ता हैं अर्थात हम जिन वयक्तियों के शोषण से तंग आकर ख़ुदकुशी कर लेते हैं तब उनकी शोषण करने की क्षमता तीव्र हो जाती हैं क्यूंकि अब तो  कोई सबूत ही नहीं बचा जो की उन्हें सज़ा  दिला  सके। आज के युवा संघर्षशील तो हैं पर उनके अंदर आत्मविश्वास ,आत्मबल और सहनशीलता की भारी कमी हैं और साथ ही साथ अन्य प्रतिभागियों के मनोबल को भी मार रहे हैं। जिस तरह से शिक्षित लोग आत्महत्या कर रहे हैं तो सरकार को भी शिक्षित बेरोजगार युवाओं के लिए सही अनुपात में रोजगार के सुअवसर प्रदान करने चाहिये ताकि कोई रोजगार के लालच में किसी दलाल से धोखा खाकर आत्महत्या जैसे कदम ना उठायें और साथ - ही - साथ हम मानवों को भी अपनी मानवता की रक्षा के लिए खुद की कुण्ठित व स्वार्थ की मानसिकता व विचारधारा को त्याग कर एक नए आत्मविश्वास के साथ स्वस्थ्य विचारधारा को जगाने की जरुरत हैं। 

Thursday, 12 March 2015

भूमि - अधिग्रहण बिल ने लगाया किसानों पर ग्रहण

भूमि - अधिग्रहण बिल ने लगाया किसानों  पर ग्रहण 

खुद को राष्ट्रभक्त बताने वाली भाजपा सरकार ने ही कृषि - प्रधान  राष्ट्र के किसानों के साथ अनदेखी कर दी और किसानों को नज़र अंदाज करते हुए भूमि - अधिग्रहण बिल को लोक - सभा में पारित कर दिया। औधोगीकरण करने से देश का विकास सम्भव हैं परन्तु देश के मुख्य आधार को ही किनारे कर देना ,ऐसा विकास देशहित में तो कदाचित प्रभावशाली नहीं होगा। लगभग पूरे देश ने इस बिल का विरोध किया हैं और आगे भी होता रहेगा क्यूंकि लोकतंत्र के पक्ष से परे हैं यह एकतरफा फ़ैसला। "जय - जवान , जय - किसान " के नारे के साथ आगे बढ़ने वाले भारत की परिभाषा अब बदलने लगी हैं ,परन्तु विडम्बना यह हैं की हम अपने खेतों को खुद ही बंजर बनाने पर तुले हैं और भूखमरी को फिर से दावत दे  रहे हैं। जिस तरह हम अंग्रेजी को अपनाकर  हिंदी को भूल रहे हैं ठीक उसी तरह हम अब अपने मूल हथियार को भी भोथर बना रहे हैं। चीन व अमेरिका जैसे देश अपने मौलिकता को अपनाकर ही आगे बढे हैं और हम  अपने मौलिकता को ही मिटाने पर तुले हैं। पूंजीपतियों की तो बल्ले - बल्ले हैं पर उनका क्या   होगा जो खेती बाड़ी के  सहारे  जिंदगी का गुजरा  कर रहे हैं। भूमि - अधिग्रहण बिल ने तो देश के किसानों  लगा दिया हैं पर देखते हैं की आखिर  कब तक यह ग्रहण हटता हैं या फिर किसानों के  ही देश में कृषकों  को  मिलेगा बंजर नुमा न्याय। 

Tuesday, 10 March 2015

अश्लीलता पर नही तो "इण्डियन डॉटर " पर प्रतिबन्ध क्यों

अश्लीलता पर नही तो "इण्डियन डॉटर " पर प्रतिबन्ध क्यों 

                       " अब किस डाल पर बनाऊँ बसेरा 
                             पत्ते - पत्ते पर  लूटेरे  बसे हैं "
निर्भया रैप केस पर बनी यह डॉक्यूमेंट्री फिल्म बहुत ही अच्छी हैं परन्तु काफी सीरियस भी हैं क्यूंकि यह केस ही काफी सीरियस हैं और बलत्कार जैसी घटना आम कैसे  हो सकती।  दिल्ली में बढ़ती बलत्कार की घटना आम आदमी और प्रशासन के लिए पेचीदा और चिंतनीय हैं क्यूंकि अब तक हम इस घटना को रोकने में विफल रहे हैं। इतने घिनौने कामों को रोकने के लिए यानि की लोगो को जागरूक करने के लिए मीडिया कर्मी   या आम लोग ही कदम उठा रहे हैं तो उनको रोकना समाज के हित में नहीं हैं। फिल्मों के माध्यम से अश्लीलता को प्रदर्शित करने पर तो कोई आपत्ति नहीं हैं तो फिर " इंडियन'स डॉटर " पर प्रतिबन्ध लगाना कितना उचित हैं ? शायद यह सोंच कर प्रतिबन्ध लगाया गया हैं की  निर्भया केस अब पुराना हो चूका हैं परन्तु सरकार यह क्यों नहीं सोंच रही हैं, की उस निर्भया के बाद भी कितनी निर्भया बेख़ौफ़ बल्त्कारियों  की  शिकार हो चुकी हैं और हो भी रही हैं। समाज को ख्याल में रखते हुए प्रतिबंधित यह फिल्म निर्भया और  निर्भया जैसे युवतियों के पक्ष  में तो तनिक भी नहीं हैं। बलत्कार रुके न रुके पर बलत्कार को रोकने वालों को  तो सरकार जरूर  रोक  सकती हैं।