भूमि - अधिग्रहण बिल ने लगाया किसानों पर ग्रहण
खुद को राष्ट्रभक्त बताने वाली भाजपा सरकार ने ही कृषि - प्रधान राष्ट्र के किसानों के साथ अनदेखी कर दी और किसानों को नज़र अंदाज करते हुए भूमि - अधिग्रहण बिल को लोक - सभा में पारित कर दिया। औधोगीकरण करने से देश का विकास सम्भव हैं परन्तु देश के मुख्य आधार को ही किनारे कर देना ,ऐसा विकास देशहित में तो कदाचित प्रभावशाली नहीं होगा। लगभग पूरे देश ने इस बिल का विरोध किया हैं और आगे भी होता रहेगा क्यूंकि लोकतंत्र के पक्ष से परे हैं यह एकतरफा फ़ैसला। "जय - जवान , जय - किसान " के नारे के साथ आगे बढ़ने वाले भारत की परिभाषा अब बदलने लगी हैं ,परन्तु विडम्बना यह हैं की हम अपने खेतों को खुद ही बंजर बनाने पर तुले हैं और भूखमरी को फिर से दावत दे रहे हैं। जिस तरह हम अंग्रेजी को अपनाकर हिंदी को भूल रहे हैं ठीक उसी तरह हम अब अपने मूल हथियार को भी भोथर बना रहे हैं। चीन व अमेरिका जैसे देश अपने मौलिकता को अपनाकर ही आगे बढे हैं और हम अपने मौलिकता को ही मिटाने पर तुले हैं। पूंजीपतियों की तो बल्ले - बल्ले हैं पर उनका क्या होगा जो खेती बाड़ी के सहारे जिंदगी का गुजरा कर रहे हैं। भूमि - अधिग्रहण बिल ने तो देश के किसानों लगा दिया हैं पर देखते हैं की आखिर कब तक यह ग्रहण हटता हैं या फिर किसानों के ही देश में कृषकों को मिलेगा बंजर नुमा न्याय।
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