Wednesday, 18 February 2015

जनता के लिए समर्पित मोदी जी

जनता के लिए समर्पित मोदी जी 

भारत में बेतुके सवालों का सिलसिला कभी टूट ही नहीं सकता। इस बार के गणतंत्र - दिवस के खास मेहमान को बुलाने पर भी जाने क्या - क्या सवाल उठे और यदि कोई नहीं आता फिर भी सवाल उठते। हमे बेशक बोलने की आजादी दे गयी हैं परन्तु आजादी का मतलब किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं होता हैं। हम यह क्यों भूल जाते हैं की समाज की सेवा करने वाले भी इंसान ही हैं और उनके अंदर भी इच्छा हैं। मोदी जी ने अपने इतनी लम्बी  ज़िन्दगी में  यदि 10 लाख का शूट ही पहन लिया तो इसमें गलत क्या हैं ? लेकिन इन बेमतलबी सवालों का जवाब हमारे मोदी जी ने बड़ी शालीनता से दे दिया हैं और एक बार फिर साबित कर दिया की उनका सबकुछ जनता के हित के लिए समर्पित हैं। लोकतंत्र में जनता के लिए यह शोभनीय नहीं हैं की हम किसी व्यक्ति की इच्छा का हनन कर दे क्यूंकि इंसान चाहे जितना भी बड़ा हो जाये वो अपनी सारी इच्छाओं पर लगाम नहीं लगा सकता हैं पर हमारे प्रधानमंत्री ने अपने शूट की नहीं बल्कि अपने इच्छाओं को नीलाम किया हैं।  जो की लोकतंत्र के हित में एक नया समर्पण हैं। 

Monday, 16 February 2015

आप का " पत्रकार रोको बिल "

आप का " पत्रकार रोको बिल "


"आप " ने तो कुर्सी पर बैठते ही रंग दिखा दिया। कुर्सी का पावर तो अच्छे - अच्छे को भर्मित कर देता हैं यानि की जब तक कुछ हाथ नहीं लगा तब तक ईमानदार बने। खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताने वाले केजरीवाल ने ही लोकतंत्र के चौथे - स्तम्भ पर वॉर कर दिया। चुनाव दौरे के समय मीडिया से जुड़े रहने वाली " आम आदमी पार्टी " अब आम नहीं रही। पूर्णबहुमत भले ही आप की हैं पर संविधान तो हमारा हैं और जब संविधान  पत्रकारों को आजादी दे चूका तो "आप " ने किस आधार पर पत्रकारों को रोक दिया ? आप की पहली कैबिनेट बैठक और पत्रकारों पर रोक की वजह मन में कई सवाल खड़े कर रहा हैं ? साफ़ - साफ़ दिख रहा हैं की यह चेहरा आम आदमी का नहीं बल्कि शासक का हैं। यह सिर्फ पत्रकारों का नही बल्कि संविधान का अपमान हैं।  पत्रकार रह चुके मनीष ने तो बाहर रोके पत्रकारों से तो आँख तक नहीं मिलाया ,सवाल- जवाब तो दूर की बात हैं। यानि की पत्रकारों का मोल नहीं करने वाले आम आदमी को क्या मोल देंगे ? अन्ना जी का जन - लोकपाल बिल अब तक लटका हैं और केजरीवाल ने " पत्रकार रोको - बिल " को तो हरी - झंडी दिखा दी। परन्तु देखते हैं आखिर कबतक भागते हैं आप पत्रकारों के सवाल से ?  

मुफ्त के वादे नहीं, रोजगार चाहिये

मुफ्त के वादे नहीं, रोजगार चाहिये 

वोट के लिए वादा करना भारत के चुनाव के लिए आम मुद्दा हैं। यही तो एक ऐसा रामबाण हैं जिसका असर आम आदमी से लेकर दमदार आदमी तक दिखता हैं। इस बार "आप " ने भी इसी का प्रयोग किया और चर्चे में भी रही।  कहीं ऐसा तो नहीं की इस "मुफ्त " के नीचे भी छोटे - छोटे अक्षरों में लिखा हैं "नियम व शर्ते लागू " । खैर जो भी हो ,वैसे भी हम 60 सालों से भारत का नव - निर्माण ही तो करते आ रहे हैं ,परन्तु अफसोस की जो बचा था उसे भी बचा ना सके।आजादी के बाद भी अबतक सिर्फ नए - नए मुद्दे ही सुनते आ रहे हैं और आज तो हाल ऐसा हो गया हैं की पढ़ - लिखकर भी बेरोजगारी की मार झेलनी पड़ रही हैं। मुफ्त की पढ़ाई , ड्रेस और खाना के साथ - साथ मुफ्त की बेरोजगारी भी मिल जाती हैं। अब हम युवाओं को अंतर्मन से जागकर मुफ्त के प्रलोभन को त्यागना चाहिए क्यूंकि जब हमारे पास रोजगार होगा तो हमारी सारे दिक्कते दूर हो जाएँगी। भूखा पेट हर काम करने को विवश हो जाता हैं और रोजगार पेट को भर कर हर विवशता को भगा देता हैं।  वादे तो हमारे परदादे भी सुने थे पर अब हमे सिर्फ रोजगार चाहिए। 

Sunday, 15 February 2015

मतदाता पहचान - पत्र की गलतियाँ सुधार हो

मतदाता पहचान - पत्र की गलतियाँ सुधार हो 

यह केवल पहचान - पत्र मात्र नहीं बल्कि लोकतंत्र को सफल बनाने का मौका प्रदान करता हैं और यह सुनिश्चित करता हैं की अब हम मतदान कर सकते हैं। 18 वर्ष की आयु के बाद बनने वाला यह पहचान - पत्र हर भारतीय नागरिक के लिए जरूरी हैं।  आधार - कार्ड पर जोर देने वाली सरकार को को मतदाता पहचान पत्र पर भी खासा जोर देना चाहिए ताकि ग्रामीण जनता इसे आसानी से बनवा सके। निर्वाचन - विभाग पंचायती शिक्षकों से मतदाता पहचान - पत्र बनवाने का कार्य करा रही हैं परन्तु अपने शिक्षण पेशा से बंधा शिक्षक अपना कार्य भलीभांति से नहीं कर पा रहे हैं या कम्प्यूटर ऑपरेटर की लापरवाही से अधिकतम  कार्ड पर छपी मतदाता की जानकारी बिलकुल ही गलत छापी जा रही हैं। एक तो बड़ी मुश्किल से बनता हैं और फिर गलत जानकारी के वजह से अधिकतम नागरिक मतदान करने से वंचित रह जाते हैं तो फिर वैसे पहचान - पत्र की क्या जरुरत हैं ? सरकार को अविलम्ब ही मतदाता पहचान -पत्र सुधार कार्यक्रम चलाना चाहिये ताकि हम नागरिक उसका सही वक़्त पर उपयोग कर अपना लोकतान्त्रिक हक़ अदा कर सके। 

Wednesday, 11 February 2015

फिर वैलेंटाइन -डे पर वार होगा ,क्या ?

फिर  वैलेंटाइन -डे पर वार होगा ,क्या ?

बसंत की बहारे यानि की महकता - दमकता चमन ,पीली लिबास में दुल्हन -सी धरा और मन चुराती कोयल की कूँ ,कूँ..,वाह ! क्या सुंदरता हैं ,काश की यह बसंत कभी जाता नहीं पर बसंत जायेगा नहीं तो फिर सावन कैसे आएगा ? इस मोहब्बत भरे माह में प्यार के लिए बनाया दिन "वैलेंटाइन -डे" जो की हम सब अपने माँ या दोस्तों के साथ मनाते हैं और बिना किसी भेदभाव के। इस प्यार के ऊपर भी कोई एतराज़ कर के कोई किसी दल के साथ वार कर के खुद को समाज का रक्षक बताता  हैं तो फिर ये कितने हद तक सही हैं ? संसार और संविधान के नियमों को ताक पर रखकर हैवानियत का खेल खेलने वालों को हक़ कौन दिया हैं ? ये सवाल तो तब तक उठेगा जब तक मोहब्बत- जिन्दा रहेगी और सच तो यह भी हैं की बिना प्यार के संसार की कल्पना करना भी निरर्थक हैं। 
हमारे देश में तो खास कर प्यार का नाम धर्म से जोड़कर  फसाद कराने की प्रथा बन चुकी हैं लेकिन निरर्थक लड़ने वालों की हमेशा हार ही होती हैं। देखना तो यह हैं की इस बार बसन्त के उड़ते परिंदो को कौन -सी सेना शिकार बनाती हैं या इंसानियत के नाते उन्हें उड़ने देती हैं "उन्मुक्त - गगन में " बेख़ौफ़। 

Tuesday, 10 February 2015

आप तो अथाह निकले

आप तो अथाह निकले 

कांग्रेस की शहर और  लहर दोनों ही "आप " के समुन्दर में समाहित हो गए। अविश्वसनीय सीटों से जीतने वाली "आप "राजनीति के हर लहर से अलग हैं क्यूँकि ये खुद में ही दो दिगज्जों की लुटिया डुबो दी ,जिसको ढूँढने कम से कम पाँच साल तो लग ही जायेंगे। अरविन्द की अजय ,पस्त दिग्गजों के लिए सदमा हैं। 2013 में शीला और 2015 में मोदी को हराने वाले केजरीवाल अब दिल्ली के ही नहीं बल्कि सबके दिल में बस चुके हैं।केजरीवाल ने यह साबित कर दिया की लोकतंत्र जीतने के लिए अभद्र भाषा और तजुरबा की कोई जरुरत नहीं हैं और हमारे शिकस्त खाए नेताओं को सीख लेनी चाहिये। भगोड़ा करार दिए जाने वाले केजरीवाल का जवाब दिल्ली की जनता ने बड़ी शालीनता के साथ दिया हैं जो की किरण की तरह साफ - साफ चमक रहा हैं। 27 सीटों को छोड़ने का फल 67 सीटों के रूप में मिला हैं क्यूँकि 49 दिनों में सत्ता से हटना यह बता रहा हैं की केजरीवाल को सत्ता की नहीं आम आदमी की फ़िक्र हैं तभी तो भगोड़ा बोलने वाले ही जनता द्वारा भगा दिए गए। "आप " ने सिर्फ मोदी लहर को ही नहीं बल्कि एग्जिट पोल के आंकड़ों को भी मात दिया। सच में सर आप श्रेष्ठ हो। समुन्दर की गहराई मापी जा सकती हैं पर आप के अंदर तो लहर नहीं लहरों का समंदर हैं परन्तु आपके वादे की नय्या तो नहीं डूबेगी न क्यूंकी दुबारा भरोसा कर के हम हम फिर से सवार हुए हैं ,खैर !ये तो वक़्त ही बताएगा -आर या पार।  लोकतंत्र में हार - जीत का खेल तो चलता रहेगा पर "आप " की जीत को भूलना नामुमकिन हैं क्यूँकि ये लहर नहीं  क्यूंकि आप तो अथाह निकले जनाब। 

दिल्ली में लोकतन्त्र की लहर

दिल्ली में लोकतन्त्र की लहर 

युवा मतदाताओं की बढ़ती भागदारी लोकतंत्र को एक नया मोड़ दे रही हैं ,जो की स्वस्थ और स्वच्छ  लोकतंत्र के लिए बहुत ही जरुरी हैं और भारत के विकास के लिए भी।  जिस तरह से हमारे बड़े - बड़े नेता "भगोड़ा " और भी जाने - जाने क्या - क्या अपशब्दों का प्रयोग कर, हमारे लोकतंत्र का हनन कर रहे हैं लेकिन ऐसे बुरे वक़्त पर हमारे युवा - शक्ति ने जो फैसला लिया हैं वो वाकई सराहनीय हैं और एक करारा जवाब हैं  समाजवाद और लोकतंत्र के ढोंगियों के लिए । एग्जिट पोल ने तो "आप " को दिल्ली का ताज पहना ही दिया था ,बस इंतज़ार था दिल्ली ईवीएम में पड़े वोटों की गिनती का जो की शुरू हो चुकी हैं और केजरीवाल आगे - आगे भाग रहे हैं क्यूंकि " भगोड़ा " जो नाम दिया  था तो असर तो दिखेगा ही । सच का विरोधी ही सच को जीताने में सहायक होता हैं और वही हुआ हैं  दिल्ली के चुनाव में। लोक - सभा में कांग्रेस ने मोदी का विरोध किया और उनकी जीत हुई और दूसरी तरफ दिल्ली के चुनाव में भाजपा ने "आप " का विरोध कर के भाजपा ने अपनी जीत की लहर को खुद ही रोक दिया । स्वछता के लिये झाड़ू का होना और शुद्धता के लिए फूल यानि पेड़ो का होना आवश्यक हैं इसलिए भारत की जनता ने मोदी को चुना और दिल्ली में सफाई की जरुरत को देखते हुए झाड़ू को युवाओं ने हाथो में उठा लिया। जिस माकन के सहारे कांग्रेस का मकान था , वह तो अपने ही घर से लापता हैं तो भला वो क्या  हाथ को सहारा देंगे ? पर क्या करे हारे को हरिनाम का ही सहारा मिलता हैं।  ६० सालों का  भारत का  सिकंदर "कांग्रेस" इतनी आसानी से घुटने टेक देगा ,इसका जवाब तो सोनिया की खामोशियां बयां कर चूकी हैं। दिल्ली की जनता ने "आप " को दिल में फिर से बसाया हैं ,कहीं ऐसा ना हो की फिर से वो सड़क पर आ जाए और हमे गाना पड़े "ये कहाँ आ गए हम …"  पर इस बात का जवाब तो वक़्त पर ही पता चलेगा क्यूँकि भारत की राजनीतिक में  कुछ भी हो सकता हैं और अब तक तो वही होते आ रहा हैं। मोदी की लहर को मात देने वाले केजरीवाल क्या अपने झाड़ू से दिल्ली की सफाई कर पाएंगे या बीते कल की तरह  खुद ही  हो जायेंगे साफ़ ? मोदी की लहर में आने वाली किरण अब "आप " में साफ़ - साफ़ झलक रही हैं ,कहीं ऐसा ना हो की फिर से बीजेपी की किरण ,"आप " की लहर में शामिल हो जाए क्यूंकि यहाँ दल- बदलना तो आम बात हैं। कालाधन जिस तरह बीजेपी पर कालिख लगा दिया हैं कहीं उसी तरह "आप " भी अपने वादे निभाएगा या मुफ्त की पानी से पानी फेरेगा दिल्ली के दिल पर। जीत चाहे जिसकी भी हो पर युवा - मतदाता की भागीदारी बता रही हैं की हमे सिर्फ  विकास  चाहिए ,झूठे - वादों की पोटली नहीं और आप चाहें जिसे भी हराए बस लोकतंत्र की हार नहीं होनी चाहिए।  देखिये कब तक चलता हैं लोकतंत्र का लहर कही ये भी अन्य लहरों की तरह थम तो नहीं जायेगा, तो चलिये आखिर "आप " की हो ही गयी जय - जय।


                                                    

Sunday, 8 February 2015

मोदी बनाम एग्जिट पोल

मोदी बनाम एग्जिट पोल 

2013 - 2015 तक के चुनावी परिणाम लोक - सभा से लेकर विधान - सभा तक चुनावी - क्षेत्रों में हलचल मचाये हुए हैं। अब तक तो हम अविश्वसनीय चुनाव - परिणाम देख ही चूके हैं परन्तु देखना तो बस यह हैं की कांग्रेस को हराने वाले मोदी क्या अपने ही दिल्ली में हार जायेंगे ? क्यूँकि दिल्ली के चुनावी एग्जिट पोल ने तो "आप" को विजय की किरण दिखा दी हैं और जो मोदी लहर  अब थमती हुयी नज़र आ रही हैं। 2013 का जो स्थान "आप" का था वहाँ पर भाजपा आ खड़ी हुयी हैं और कांग्रेस तो लड़ाई से पहले ही हार मान चुकी हैं इसलिये तो जनता की भाँति सोनिया भी चुप्पी साधी चुनाव का आनंद ले रही हैं। पर किरण बेदी के बयान अब भी जीत की कहानी को बयां कर रहे हैं और अब लड़ाई "आप " से नहीं दिल्ली के एग्जिट पोल से शुरू हो चुकी हैं।क्या मोदी लहर दिल्ली के एग्जिट पोल को भी मात देगी या केजरीवाल की होगी जय - जय ?

                                                                -रवि कुमार गुप्ता
                                                                लालबेगी ,गोपालगंज {बिहार }
                                                               मो.नॉ.- +919471222508 

Thursday, 5 February 2015

चुनाव - प्रचार या आलोचना - प्रसार

चुनाव - प्रचार या आलोचना - प्रसार 


बात चाहे दिल्ली की हो या अन्य राज्यों के चुनाव - प्रसार की हो होता तो बस एक जैसा ही हैं।  आम आदमी को समानता मिले न मिले  समानता तो दिखने को मिलती हैं - आलोचना करना।  पंचायती - राज से लेकर लोक- सभा चुनाव तक का यह दोषारोपण का सिलसिला अब अपने चरम सीमा पर हैं, बिना किसी विरोध के।  एक तरफ हमारे नेता खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं और चुनाव - प्रचार कर मंच पर आते ही शुरू करते हैं ,अभद्र भाषाओं का अविराम आलोचना - प्रसार।  दोषारोपण की यह प्रक्रिया साफ़ - साफ़ बता रही हैं की अब इनके पास अपने बारे में भी अच्छा बोलने का एक शब्द तक नही हैं और हमलोग इनके ही हाँथो लोकतंत्र की बागडोर सौंपने जा रहे हैं ,जो की लोकतंत्र की कम "ढोंगतंत्र" की ही बस बात करते हैं। 


                                                   - रवि कुमार गुप्ता 
                                                    लालबेगी , गोपालगंज {बिहार}